पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आर्थिक नीति को नागरिकों के जीवन पर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों को विनियमित करने के केंद्र सरकार के दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाए।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA), जो सरकार की औषधि मूल्य नियामक संस्था है, ने अनुसूची में शामिल न की गई 137 कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक सीमित कर दिया।
- व्यापारिक मार्जिन से तात्पर्य उस अंतर से है, जो किसी दवा को खरीदने की कीमत और वितरकों, खुदरा विक्रेताओं या अस्पतालों जैसे मध्यस्थों द्वारा उसे बेचने की कीमत के बीच होता है।
औषधि मूल्य नियंत्रण पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
- न्यायालय ने अस्पतालों द्वारा दवाएँ खरीदने की कीमतों और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमतों के बीच व्यापक अंतर पर सवाल उठाए।
- न्यायालय ने NPPA की अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में विफलता पर भी चिंता व्यक्त की। इसके अतिरिक्त, उसने यह प्रश्न उठाया कि चुनिंदा कैंसर-रोधी दवाओं के लिए व्यापारिक मार्जिन संबंधी सीमाएँ क्यों लागू की गईं तथा क्या इसी प्रकार के सुरक्षा उपाय अन्य आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों पर भी लागू किए जाने चाहिए।
औषधि मूल्य विनियमन की वर्तमान व्यवस्था
- औषधियाँ (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO), 2013: आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी यह आदेश सरकार को अनुसूचित औषधि-योगों की कीमतों को विनियमित करने और गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों की निगरानी करने का अधिकार प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA): यह प्राधिकरण औषधियाँ (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO), 2013 के प्रावधानों के अंतर्गत दवाओं की कीमतें निर्धारित करने और उनमें संशोधन करने के लिए उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त, यह नियमों के अनुपालन की निगरानी करता है, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता है तथा औषधि संबंधी नीतियों पर सरकार को परामर्श देता है।
- आवश्यक औषधियों की राष्ट्रीय सूची (NLEM): स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार की जाने वाली इस सूची में उन दवाओं की पहचान की जाती है, जो स्वास्थ्य सेवा की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।
- किसी दवा को NLEM में शामिल किए जाने से सामान्यतः उसके अंतर्गत आने वाले औषधि-योगों को DPCO के माध्यम से मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने का आधार प्राप्त होता है।
- व्यापारिक मार्जिन का विनियमन और मूल्य निगरानी: DPCO, 2013 के अंतर्गत अनुसूचित औषधि-योगों के अधिकतम मूल्य की गणना में खुदरा विक्रेता के लिए 16% का एक मानक मार्जिन शामिल किया जाता है।
- गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माताओं को सामान्यतः कीमतें निर्धारित करने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन विगत 12 महीनों की अवधि की तुलना में अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में वार्षिक वृद्धि 10% तक सीमित है।
- सरकार जनहित में व्यापारिक मार्जिन पर विशिष्ट सीमाएँ भी निर्धारित कर सकती है।

न्यायालय के निर्णय का महत्त्व
- स्वास्थ्य का अधिकार: किफायती दवाओं तक पहुँच का संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 से है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित अनुच्छेद 47 का भी समर्थन प्राप्त है। आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन इन संवैधानिक दायित्वों के आधार पर किया जाना चाहिए।
- वित्तीय कठिनाइयों का समाधान: अधिक कठोर विनियमन से मरीजों द्वारा स्वयं से किए जाने वाले स्वास्थ्य व्यय में कमी आ सकती है और कमजोर परिवारों को स्वास्थ्य सेवा की अत्यधिक लागत के कारण उत्पन्न होने वाले गंभीर वित्तीय संकट से बचाया जा सकता है।
- नियामक जवाबदेही: यह निर्णय अत्यधिक मूल्य-वृद्धि पर अंकुश लगाने और अधिक वसूली गई राशि की समयबद्ध वापसी सुनिश्चित करने के लिए NPPA द्वारा सक्रिय एवं प्रभावी कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?
- नवाचार और निवेश पर प्रभाव: औषधि उद्योग का तर्क है कि अनुसंधान, नवाचार, गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिफल का पूर्वानुमेय होना आवश्यक है।
- असमान क्रियान्वयन: विभिन्न अस्पतालों और राज्यों में दवाओं की खरीद संबंधी प्रक्रियाओं, मूल्य पारदर्शिता और नियामकीय प्रवर्तन में अंतर होने के कारण नियामकीय हस्तक्षेपों के लाभ सीमित हो सकते हैं।
आगे की राह
- NPPA के प्रवर्तन तंत्र को सुदृढ़ करना: मूल्य निगरानी व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाना चाहिए तथा नियमों के उल्लंघन के मामलों में उल्लंघन की प्रकृति और गंभीरता के अनुरूप दंड लगाया जाना चाहिए।
- मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ाना: अस्पतालों और फार्मेसियों के लिए दवाओं की कीमतें सार्वजनिक करना तथा मदवार बिल उपलब्ध कराना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे मरीज विभिन्न स्थानों पर कीमतों की तुलना कर सकेंगे और अत्यधिक शुल्क की पहचान कर सकेंगे।
- किफायती दवाओं तक पहुँच का विस्तार: जन औषधि केंद्रों, जेनेरिक दवाओं के चिकित्सकीय नुस्खों को प्रोत्साहित करने तथा सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में प्रयास सुदृढ़ किए जाने चाहिए।
- नियमित समीक्षा सुनिश्चित करना: NLEM और मूल्य नियंत्रण के अधीन दवाओं की सूची को समय-समय पर अद्यतन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में नई चिकित्सा पद्धतियों, रोगों के बढ़ते भार और दवाओं की वहनीयता से संबंधित चिंताओं को शामिल किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 27-10-2026